आयुर्वेद में हजारों वर्षों से उपयोग की जाने वाली औषधियों में दशमूलारिष्ट एक महत्वपूर्ण नाम है। इसे शरीर के अनेक रोगों और असंतुलनों में प्रयोग किया जाता है। दशमूल का अर्थ है दस जड़ें – अर्थात दस प्रकार की जड़ों से बनी औषधि। इन जड़ों को विभिन्न रोगों को दूर करने, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और संपूर्ण स्वास्थ्य को संतुलित रखने के लिए जाना जाता है।
दशमूलारिष्ट एक प्रकार का आसव–आरिष्ट (फर्मेंटेड हर्बल टॉनिक) है जिसे पारंपरिक आयुर्वेदिक प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। इसमें मुख्यतः 10 जड़ों के साथ-साथ शर्करा, मधु (शहद) और अन्य सहायक औषधीय द्रव्य मिलाए जाते हैं, जिससे यह शरीर में आसानी से अवशोषित होकर गहराई तक असर करता है।

दशमूल क्या है?
दशमूल का शाब्दिक अर्थ है दस मूल यानी दस जड़ें। इसे दो भागों में बांटा गया है:
- बृहद पंचमूल – बिल्व, अग्निमंथ, शालपर्णी, बृहती और कण्टकारी।
- लघु पंचमूल – पाटला, गोकर्ण, श्योनक, शालपर्णी और पृश्निपर्णी।
इन सभी जड़ों को मिलाकर जो संयोजन तैयार होता है, वही दशमूल कहलाता है। दशमूल वात, पित्त और कफ – तीनों दोषों को संतुलित करने में मदद करता है।
दशमूलारिष्ट की तैयारी
दशमूलारिष्ट को पारंपरिक किण्वन (Fermentation) प्रक्रिया द्वारा बनाया जाता है। इसमें दशमूल की जड़ों को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार किया जाता है। फिर इसमें गुड़ या शहद और अन्य औषधीय द्रव्यों को मिलाकर मिट्टी के पात्र में बंद करके रखा जाता है। समय के साथ इसमें प्राकृतिक रूप से अल्कोहल (लगभग 5–10%) बनती है, जो औषधि के गुणों को लंबे समय तक सुरक्षित रखती है और इसे शरीर में शीघ्र अवशोषित करने योग्य बनाती है।
दशमूलारिष्ट के प्रमुख फायदे
1. स्त्रियों के रोगों में लाभकारी
दशमूलारिष्ट को विशेष रूप से महिलाओं के लिए वरदान माना जाता है।
- प्रसव के बाद होने वाली कमजोरी और थकान में लाभकारी।
- मासिक धर्म की अनियमितता और दर्द को कम करता है।
- गर्भाशय को मजबूत बनाता है और डिलीवरी के बाद जल्दी रिकवरी में मदद करता है।
2. वात रोगों में उपयोगी
दशमूल वात दोष को संतुलित करता है।
- जोड़ों का दर्द
- गठिया (Arthritis)
- नसों में जकड़न
- पीठ दर्द और साइटिका
इन सभी स्थितियों में यह औषधि राहत देती है।
3. बुखार और सूजन में लाभकारी
दशमूलारिष्ट में ज्वरनाशक और सूजन कम करने वाले गुण हैं। पुराने बुखार, शरीर में जकड़न और अंगों की सूजन में इसका प्रयोग किया जाता है।
4. पाचन शक्ति सुधारता है
यह पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है।
- गैस, अपच और भूख न लगना
- पेट दर्द और कब्ज़
इन समस्याओं में यह लाभकारी है।
5. शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है
दशमूलारिष्ट शरीर को बल और ओज प्रदान करता है। यह एक प्राकृतिक टॉनिक की तरह काम करता है और लंबे समय तक शरीर को सशक्त और रोग प्रतिरोधक बनाता है।
6. हृदय और श्वसन रोगों में सहायक
यह औषधि रक्त संचार को बेहतर बनाती है और हृदय को मजबूती देती है।
- अस्थमा
- खांसी
- सांस लेने में कठिनाई
इनमें भी यह उपयोगी साबित होती है।
सेवन विधि
सामान्यत: आयुर्वेदाचार्य की सलाह अनुसार इसकी खुराक होती है:
- 15–30 ml दशमूलारिष्ट, बराबर मात्रा में पानी मिलाकर, दिन में दो बार भोजन के बाद।
👉 खुराक उम्र, रोग और शारीरिक क्षमता के अनुसार बदल सकती है। इसलिए विशेषज्ञ की सलाह लेना आवश्यक है।
सावधानियाँ
- गर्भवती महिलाएं इसे डॉक्टर की सलाह के बिना न लें।
- डायबिटीज रोगियों को इसमें मौजूद गुड़ और शहद के कारण सावधानी बरतनी चाहिए।
- अत्यधिक मात्रा लेने से दस्त, कमजोरी या पेट में गड़बड़ी हो सकती है।
- इसे हमेशा आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में लेना उचित है।
निष्कर्ष
दशमूलारिष्ट आयुर्वेद की एक अद्भुत औषधि है जो महिलाओं के स्वास्थ्य से लेकर जोड़ों के दर्द, पाचन, श्वसन और संपूर्ण शरीर को मजबूत बनाने में सहायक है। यह न केवल रोगों से राहत देती है बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और ऊर्जा को भी बढ़ाती है।
यदि इसे सही मार्गदर्शन और मात्रा में लिया जाए, तो दशमूलारिष्ट आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी कई समस्याओं का प्राकृतिक समाधान हो सकता है।








